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प्रॉपर्टी खरीदने से पहले जानें नए कानून, मिलेगा फायदा

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प्रॉपर्टी खरीदने से पहले जानें नए कानून, मिलेगा फायदा

केंद्र सरकार ने रियल एस्टेट में लोगों के बढ़ते रुझान और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उपभोक्ता के हित के लिए नये रियल एस्टेट कानून को प्रभावी रूप से लागू कर दिया है. इस वर्ष 1 मई से उपभोक्ताओं को इसका लाभ मिलने लगेगा. कानून के आधार पर उपभोक्ताओं को सीधे लाभ मिलेगा और पारदर्शिता से उन्हें किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं रहेगा.

उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और बिल्डरों की जवाबदेही तय करने में यह कानून अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी. बिल्डरों को तय समय सीमा के अंदर ग्राहकों को उनके फ्लैट उपलब्ध कराना होगा अगर वह ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो जुर्माना चुकाना होगा. आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय ने रियल एस्टेट कानून की 92 में से 69 धाराओं को बुधवार को ही अधिसूचित कर दिया है और जल्द ही इसके लिए मॉडल रेगुलेशन भी तैयार कर लिया जाएगा. यदि आप भी नये वर्ष में फ्लैट, प्लाट, घर, ऑफिस या कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदने की सोच रहे हैं तो इन मुख्य बातों को जानने से आपको लाभ हो सकता है.

तय सीमा पर उपलब्ध होंगे प्रोजेक्ट

नए कानून के अनुसार यदि आपने कोई फ्लैट या घर बुक कराया है तो प्रमोटर और बिल्डर को तय सीमा के अंदर प्रोजेक्ट पूरा कर आपको हैंडओवर करना आवश्यक होगा. प्रोजेक्ट पूरा करने में देरी या नियमों का उल्लंघन  करने वाले बिल्डरों पर भारी जुर्माने के साथ ही तीन साल तक की सजा का भी प्रावधान है. कानून में सभी आवासीय और कमर्शियल प्रोजेक्टों के लिए रियल एस्टेट रेगुलेटर के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा. यह नियम नई और वर्तमान में चालू परियोजनाओं दोनों पर लागू होगा.

रियल एस्टेट रेगुलेटर की होगी नजर

आमतौर पर खरीदारों को फ्लैट बुक कराने के बाद पजेसन के लिए वेट करना पड़ता है. रेडी पजेसन की समय सीमा निकलने के बाद भी लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है. इन सभी समस्याओं के निपटारे के लिए केंद्र सरकार रियल एस्टेट रेगुलेटर टीम बनाएगी जिसमे उपभोक्ताओं और रियलटी कंपनियों की शिकायतें 60 दिनों के भीतर हल की जाएंगी एवं कंपनियों को 15 माह के भीतर प्रोजेक्ट को पूरा करना अनिवार्य होगा. रियल एस्टेट रेगुलेटर हर राज्य में विवाद व इससे जुड़े सभी पहलूओं पर अपनी नजर बनाए रखेगी और इस कानून को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा. राज्य सरकार अपने डिमांड के हिसाब से इसमें कुछ सूक्ष्म परिवर्तन कर सकते है. राज्यों को 31 अप्रैल 2017 से पहले करते हुए अपने राज्य में रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन करना होगा. प्रमोटर और डेवलपर को नए और वर्तमान में चालू आवासीय एवं कमर्शियल दोनों प्रोजेक्ट का पंजीयन इसके अधीन करना आवश्यक होगा व जिन प्रोजेक्ट्स को कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला है वह भी इसके दायरे में शामिल होंगे.

बिना सहमती स्ट्रक्चर में नहीं होगा बदलाव

फ्लैट बुकिंग के दौरान तैयार स्ट्रक्चर में बिल्डर या डेवलपर बिना ग्राहक की सहमती के कोई बदलाव नहीं कर सकते. अगर ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो डेवलपर को स्ट्रक्चर में बदलाव के लिए अपने दो-तिहाई खरीदारों से सहमती लेनी होगी साथ ही जमीन का बिमा कराना भी आवश्यक होगा. निर्माण के बीच में डेवलपर बिल्डिंग मटेरियल के दामों में वृद्धि होने का हवाला देकर फ्लैट्स या मकान के दामों में वृद्धि नहीं कर सकता. पजेशन में देरी करने पर उसे अपने ग्राहकों को 11% ब्याज की दर से ब्याज देना होगा और खरीददार किस्त में देरी करता है तो उसे भी इसी दर से जुर्माना लगेगा. पूर्व में किस्त देरी से देने पर 15% की दर से जुर्माना देना पड़ता था इससे बायर्स को भी राहत मिलेगा. अगर ग्राहक रिफंड का दावा करता है तो बिल्डर को दावा मिलने के 45 दिनों के अंदर पैसा वापस करना पड़ेगा.

छोटे बिल्डर भी होंगे रेगुलेट 

नए कानून के तहत छोटे बिल्डर को भी रेगुलेट किया जाएगा. पहले कानून में प्रोजेक्ट एरिया 1,000 वर्ग मीटर रखा गया था परन्तु इसे घटाकर 500 वर्ग मीटर कर दिया गया है. संसद में पास कानून में 500 वर्ग मीटर से बड़े प्लॉट या 8 फ्लैट वाली सोसायटी को रियल एस्टेट रेगुलेटर अथॉरिटी के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा. हालांकि राज्य सरकारों के पास अधिकार होगा कि वे प्लॉट साइज और फ्लैटों की संख्या कम या ज्यादा कर सकते हैं.

 

photo credit –  madhyam.com, home.hanewsmedia.com, santosaleman.com, planta-da-casas.com, images4.roofandfloor.com

 

 

 

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